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पूज्य रमणी गुरुजी काक भुजंदर जीव नाड़ी का पठन शुरु करने से पहल एक वंदना करते हैं। उसका महत्व तथा अर्थ बहुत कम तमिल भाषियों को समझ में आता है। उस प्रस्तुत किया जा रहा है।

शक्ती, सिद्धी और बुद्धी के दाता जटाधारी भगवान शिवजी, जो अखिल जगत के लिए परमानन्ददायी है, उनके चरण स्पर्श करके.... तथा "वेल" नाम का आयुध धारण करनेवाले जो भगवान कन्दस्वामी षण्मुखन्जी हैं, उनके चरणस्पर्श करके..... तथा भगवान श्री चतुर्मुखी गणेशजी के भी चरणस्पर्श करके और साथ ही भगवान श्री महाविष्णुजी के चरणस्पर्श करके ..... अटूट भक्ती के साथ माता शंकरीजी को नमस्कार करके.... मन में सुकर्म, अच्छे कर्म याचना के साथ ही माता पार्वतीजी के चरणस्पर्श करके.... जो स्वयम् ॐ कारस्वरूप है, जो स्वयम् प्रकाशरूप में स्थित हैं... जो स्वयम् अकार उकार मकार आज शरीररूप धारण कर सच्चिदानन्दरूप आशिर्वादोंकी वर्षा कर रहा हैं... जो स्वयम् खुले अंबर के नाथ है ... जिसके बताए हुए मार्ग पर अखिल ब्रह्माण्ड स्थित हैं... जिसने प्रकृतिस्वरूप उमामहेश्वरीजी को अपना आधा शरीर प्रदान किया है... उन कैलासपति भगवान शंकरजी के आशिर्वादोंसे आज यहाँ पर इकठ्ठा हुए आप सब लोगोंके आयुष्य में आनंद, सुख, अच्छाईयाँ नितनित के लिए प्रस्थापित रहें ऐसी प्रार्थनाएँ हैं।